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meri jindagi k kuch lamhon ki daastan,meri zubaan....

 आज फिर   न जाने क्यों , जिंदगी खोई-खोई सी लगती है फिर न जाने क्यूँ ,जिंदगी एक रुबाई सी लगती है हँसता तो आज भी हूँ मगर ये हंसी कंही खोई खोई सी लगती है जीता तो आज भी हूँ मगर ,ये जिंदगी भी अब एक रुबाई सी लगती है……… जीता चला जा रहा हूँ बस , जिंदगी में कोई मुकाम नहीं करने को कुछ नहीं है ,फिर भी न जाने क्यूँ आराम नहीं कहते हैं की जिंदगी हर काली रात के बाद एक नया सवेरा लाती है लेकिन कोई ये नहीं कह्ता की वो रात  कितनी लम्बी हो जाती है………। बचपन में सपने तो हमने भी कई देखे थे लेकिन क्या पता हमें,की उन सपनों को  देखते-देखते हम  अंधे हो जाएँगे आज भी जीने का कोई मकसद नहीं मेरे पास,बस अपना फ़र्ज़  जा  रहा हूँ जिन  माँ बाप ने पाला -पोसा ,बड़ा किया ,उनका क़र्ज़ निभाए जा रहा हूँ …. लेकिन न जाने क्यूँ ,आज भी जीने का दिल करता है, दूसरों को खुश देखकर मुझे भी खुश होने का दिल करता है वैसे तो सब अपने लिए जीते ही हैं ...  लेकिन मुझे खुद के लिए न सही, किसी दुसरे के लिए भी जीने का दिल करता है…।